
चाहे नीतीश की सरकार स्पष्ट बहुमत के साथ बने या फिर जोड़-तोड़ के साथ, लेकिन लगभग यह तय हो गया है कि सत्ता की दौड़ से राजद बाहर ही है.
15 वर्षों तक राज्य की सत्ता पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से काबिज रहने वाले व केंद्र में दमदार नेता के रूप में दहाड़ने वाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आ रही है.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि लालू प्रसाद यादव चुनाव पूर्व स्वयं को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश नहीं करते तो शायद इससे अधिक सीटों के प्रति आशान्वित हुआ जा सकता था, इससे यह तय हो जाता है कि राज्य में उनकी विश्वसनीयता कम हुई है और लोग फिर उन्हें अपना मुखिया बनाने के मूड में नहीं है.
राज्य के आम मतदाताओं की बात करें तो उन्हें नीतीश से शिकायतें तो हैं, लेकिन जब वे लालू से उनकी तुलना करते हैं तो नीतीश ही उन्हें बेहतर मुख्यमंत्री के तौर पर नजर आते हैं.
लालू की घटती पकड़ को देखते हुए ही कांग्रेस खुद को बिहार में अपने दम पर फिर से मजबूत करना चाहती है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार अब तक जो भी सर्वे आएं हैं उनमें से शायद ही कोई सच हो. क्योंकि ये सर्वे वर्तमान परिदृश्य को दर्शाते हैं.
सारे परिदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो यह साफ है कि सर्वे में अनुमानित सीटें दलों को न मिले. इससे ऊपर नीचे होगा ही, जो स्वाभाविक है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि इस चुनाव में सभी दलों को फायदा होगा, नुकसान सिर्फ राजद-लोजपा गठबंधन को ही होने जा रही है.
बिहार में पिछले कई चुनावों में देखा गया है कि मतदाताओं की खामोशी अंतिम समय में कुछ अलग ही गुल खिलाती है, लेकिन इन सब के बावजूद राजद-लोजपा गठबंधन की सत्ता में वापसी के आसार नहीं दिख रहे हैं. वहीं नीतीश के लिए राह कठिन तो नहीं लेकिन आसान भी नहीं है.